Haryana

क्रूर यौन अपराधों संबंधी कानून में बदलाव जल्द: महिला वकील की PIL पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र ने तेज की तैयारी

  • Hindi News
  • Local
  • Chandigarh
  • Changes In The Law Related To Brutal Sexual Offenses Soon, After SC Order On PIL Of Female Lawyer, Now The Center Is Preparing For Speedy

बृजेन्द्र गौड़, चंडीगढ़14 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

केंद्रीय गृह मंत्रालय समेत कानून मंत्रालय महिलाओं के प्रति क्रूर यौन अपराधों को लेकर जरुरी बदलाव करने जा रहा है। महिला वकील और सोशल एक्टिविस्ट कीर्ति आहूजा की एक जनहित याचिका में कुछ सिफारिशें लागू करवाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अधीन महिला वकील ने अपनी सिफारिशों को इन दोनों मंत्रालयों समेत महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भेजा था। केंद्र का इस पर जवाब आया है कि संबंधित कानूनों को लेकर विस्तृत मूल्यांकन शुरू कर दिया जा चुका है।

सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट कीर्ति आहूजा के इन सुझावों और सिफारिशों की प्रशंसा की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य अथॉरिटीज़ को आदेशात्मक रुप से विचार करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने इस मामले में कहा था कि वह उम्मीद करते हैं कि केंद्र सरकार और अन्य पक्ष इन सिफारिशों पर विचार कर उचित कार्रवाई करेगा।

ऐसे में याची द्वारा इन सिफारिशों को भारत सरकार को भेजा गया और 9 सितंबर, 2021 को गृह मंत्रालय एवं कानून मंत्रालय ने 28 जनवरी, 2022 को पत्र के जरिए जवाब पेश किया। इसमें कहा गया कि क्रूर यौन शोषण की घटनाओं में कानून को और सख्त बनाने संबंधी सिफारिशों पर सार्थक रुप से प्रतिक्रिया देंगे। वहीं आगामी कार्रवाई के लिए इसे शिक्षा मंत्रालय को भी भेजा गया है।

यह सिफारिशें की थी, जिन पर केंद्र कर रहा है विचार

एडवोकेट कीर्ति अहुजा ने अक्तूबर, 2020 में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें सिफारिश की गई थी कि क्रूर दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं में जहां पीड़ित बुरी तरह से जख़्मी हो जाए या उसकी मौत हो जाए, वहां आरोपी के लिए जमानत की प्रक्रिया उतनी ही सख्त हो जितनी पोस्को, पीएमएलए और एनडीपीएस एक्ट में होती है।

क्रूर यौन अपराधों में पीड़िता को अपनी पसंद का वकील करने का अधिकार होना चाहिए। इसके लिए सीआरपीसी की धारा 301 में संशोधन की सिफारिश की गई थी। इसके अलावा महिलाओं के साथ क्रूर यौन अपराधों में जहां पीड़िता को गंभीर चोटें आई हों, सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं और सामूहिक दुष्कर्म में मौत होने आदि में पोक्सो की तरह अलग कानून लाया जाए।

अपील केसों में भी फास्ट ट्रैक हो

ऐसे केसों में सिर्फ ट्रायल के दौरान ही फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बल्कि अपील केसों में भी फास्ट ट्रैक सुनवाई हो। इसके लिए सीआरपीसी की धारा 173 और 309 में वर्ष 2018 में किए गए संशोधनों को सही परिप्रेक्ष्य में लागू करने की सिफारिश की गई थी। ऐसे गंभीर अपराधों में आरोपी द्वारा अपील के अधिकार के प्रावधान में बदलाव होना चाहिए। आरोपी को सिर्फ एक बार अपील का अधिकार होना चाहिए। वह चाहे हाईकोर्ट में हो या सुप्रीम कोर्ट में।

निर्भया कांड के बाद देश भर में इंसाफ की आवाज उठी थी।

निर्भया कांड के बाद देश भर में इंसाफ की आवाज उठी थी।

ऐसे दुष्कर्म के मामलों में आरोपी पर रिवर्स ओनस का प्रावधान होना चाहिए जैसा की पोक्सो एक्ट में धारा 29 और 30 में है। जानबूझकर जांच में लापरवाही बरतने और कानूनी प्रक्रिया न अपनाने वाले पुलिस अफसरों पर सजा का सख्त प्रावधान होना चाहिए। इसके अलावा मांग की गई थी कि मौजूदा दुष्कर्म संबंधी कानूनों की उचित पालना को लेकर सख्त दिशानिर्देश लागू किए जाए। वहीं ऐसे कानूनों की सख्ती से लागू न करवाने वालों पर कार्रवाई की मांग की गई थी।

आदेशों के बावजूद पीड़िता की पहचान उजागर क्यों

हैदराबाद और हाथरस कांड में पीड़िताओं की पहचान कई सोशल मीडिया प्लेटफार्म और न्यूजपेपर्स आदि में पब्लिक कर दी गई थी। वहीं कई जगह पीड़िताओं की तस्वीर भी छापी गई और वायरल हुई। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा निर्देंशों की उल्लंघना और आईपीसी की धारा 228 ए के तहत अपराध बताया गया है। ऐसे में कानून को सख्ती से लागू करने की मांग की गई थी।

वहीं कहा गया था कि सख्त मापदंडों के साथ पुलिस के लिए विशेष ट्रेनिंग देना होगा ताकि ऐसे केसों में जांच के दौरान खामियां न हों। ऐसे अपराधों के प्रति जागरुकता फैलाना और शिक्षा देना भी आवश्यक कार्यक्रम होना चाहिए। वहीं जेंडर सेंसिटाइजेशन, नैतिक शिक्षा और सेक्स एजुकेशन को भी स्कूली पाठ्यक्रम बनाने की सिफारिश की गई थी।

एडवोकेट कीर्ति आहूजा लंबे समय से महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं।

एडवोकेट कीर्ति आहूजा लंबे समय से महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं।

कानून घड़ी है, सुइयों को सही करने की ज़रुरत

एडवोकेट कीर्ति आहूजा के मुताबिक, कानून और संस्थाएं घड़ी की तरह होती हैं। इन्हें कई बार साफ करना पड़ता है, ठीक और सही समय सेट करना पड़ता है। कानून हमेशा एक सा नहीं रहता। यह एक बदलाव की प्रक्रिया के अधीन है। समय और परिस्थितियों के साथ इसके बदलते रहने की जरुरत होती है। जब यह समय की मांग के साथ न्याय स्थापना में फेल होता है तो यह खतरनाक ढांचा बन जाता है जो सामाजिक विकास को रोक देता है।

इसलिए उठाई आवाज

वकील कीर्ति आहूजा का कहना है कि एक वकील होने के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में प्राप्त अनुभव और गहन रिसर्च के बाद पाया कि कानून जैसा की किताबों में है, चाहे जितना भी गंभीर क्यों न हो, यह मकसद पूरा नहीं कर पाता जब तक इसे लागू करने की सख्त प्रक्रिया न हो। एडवोकेट कीर्ति आहूजा ने बताया कि लंबे समय से महिलाओं और बच्चों के लिए कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ने के दौरान उन्होंने पाया कि प्रक्रियात्मक रुप से मौजूदा कानूनी व्यवस्था में कई खामियां हैं। ऐसे में कानून पूरी तरह लागू नहीं हो पाता और उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

धरातल पर लागू नहीं पहुंच पाता ‘न्याय’

वह कहती हैं कि बर्बरता वाली घटना ‘निर्भया कांड’ को हुए 9 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस घटना को लेकर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुआ था। इसके बाद वर्ष 2013 और 2018 में आपराधिक कानून में संशोधन भी हुए। हालांकि इसके बावजूद ऐसी घटनाएं और बढ़ी हैं एवं ज्यादा जघन्य हुई हैं। इसका बड़ा कारण कानून को धरातल पर लागू न करवा पाना है। आईपीसी में संशोधनों के बाद दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म, ऐसी घटनाओं में जान जाने और गंभीर रूप से घायल करने के मामलों में सजा सख्त की गई है। हालांकि आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रक्रियात्मक खामियां होने के चलते इन सख्त संशोधनों के बावजूद मकसद पूरा नहीं हो रहा है।

15 वर्षों से फाइटिंग कर रहीं हैं एडवोकेट कीर्ति आहूजा

एडवोकेट कीर्ति आहूजा पिछले 15 वर्षों से ‘फाइट फॉर यूअर राइट’ नामक अभियान चलाए हुए हैं। इसके तहत वह आम लोगों के लिए कानूनी जागरुकता कार्यक्रम चलाती हैं। युवा बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में बताती हैं। बच्चों और महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी देती हैं। वह महाराष्ट्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की मेंबर हैं।

खबरें और भी हैं…

Source link

Related Articles

Back to top button